जब से यह धरती बनी है ..और अंतरिक्ष में आई है .तब से ही यहाँ एक महाघटना का घटित होना बाकी है .वह घटना है ...प्यार .कहने में तो विश्व के प्रत्येक छोर में हमने बहुत सारी सच्ही प्रेकथाएं पढ़ी है ...लेकिन इन सभी कथाओं का अंत ...मृत्यु ,विछोह ,नफरत या धोखेबाजी का एक धिक्कारा हुआ गीत ही बन कर रह गया है...
मेरा यह अटूट विश्वास है कि प्रेम रुपी महाघटना का धरती पर अभी भी घटित होना बाकी है .आदम,हव्वा से लेकर वर्तमान स्त्री -पुरुष के बीच का प्रेम मात्र एक साहित्यिक और शास्त्रीय परिसंवाद मात्र है ...क्योंकि प्रेम वह महाघटना है ,जिसके घटित होते ही अंतरिक्ष में घूमती यह धरती ''नर्त्यमुद्रा ''में आ जाएगी ..और इसका सूर्य के चारों और बेचेनी से चक्कर लगाने का दौर समाप्त हो जायगा .हाँ ..एक बात मैं कुछ नयी बताना चाहता हूँ ...आजकल धरती पर शुगर ,ब्लडप्रेसर जैसी बीमारियों का आम होना यही दर्शाता है कि अंतरिक्ष में हमारी धरती माँ बहुत बैचैन और निराश है ...
तो प्रेम क्या है ?
यह प्रश्न आपके दिमाग में अब जरूर उठ रहा होगा ..अभी तक के प्रेम को गीतकारों ,कवियों और ऋषि -मुनियों ने इन शब्दों में व्यक्त किया है कि स्त्री की ''आँखें''ही धरती का सबसे पवित्र ''प्रेमशास्त्र''होता है और पुरुष का ''ह्रदय'' इस प्रेमशास्त्र का पहला और अंतिम ''प्रेमशब्द''है .ऐसा सही भी है .लेकिन इस मिलन के परिणाम स्वरुप -साहित्य ,साम्राज्य ,संगीत और संतान का ही जन्म हुआ है .आत्मस्वर का एक 'गहरा श्वास' भी इसके परिणामस्वरुप घटित नहीं ही पाया है ...वरना ऐसा नहीं होता कि मुझे यह सबकुछ लिखना पड़ता ?
अब ऐसा क्यों नहीं हो पाया है ?
तो मेरा उत्तर है ..पहला कारण-जब कभी भी धरती पर ''वह'' युवक पैदा होगा ...तो उसकी आँखों और ह्रदय दोनों का स्वाभाव SPACE VALUE BASED...होगा .और जब कभी भी ''वो'' युवती पैदा होगी तो उसकी आँखें ,ह्रदय और शरीर..ये तीनों कमलपुष्प की गंध से महकते और दमकते हुए होंगें ...इन दोनों के मध्य कोई बात नहीं होगी ..बस थरथर्राते होंठों और डबडबायी आँखों से वे एक दुसरे को देखंगें ...और यह देख कर पूरी धरती महकता हुआ गुलाब का पुष्प हो जायगी ...
अभी धरती पर संवाद ,विवाद और विवाह का दौर चल रहा है ..
दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि एक ही काल में उन दोनों का जन्म लेना जरूरी है ..जो दुर्भाग्य से अभी तक हो नहीं पाया है .
आजकल धरती इसी ''महाप्रतीक्षा'' कि गंध से महक रही है .....
रविदत्त मोहता ,भारत
मेरा यह अटूट विश्वास है कि प्रेम रुपी महाघटना का धरती पर अभी भी घटित होना बाकी है .आदम,हव्वा से लेकर वर्तमान स्त्री -पुरुष के बीच का प्रेम मात्र एक साहित्यिक और शास्त्रीय परिसंवाद मात्र है ...क्योंकि प्रेम वह महाघटना है ,जिसके घटित होते ही अंतरिक्ष में घूमती यह धरती ''नर्त्यमुद्रा ''में आ जाएगी ..और इसका सूर्य के चारों और बेचेनी से चक्कर लगाने का दौर समाप्त हो जायगा .हाँ ..एक बात मैं कुछ नयी बताना चाहता हूँ ...आजकल धरती पर शुगर ,ब्लडप्रेसर जैसी बीमारियों का आम होना यही दर्शाता है कि अंतरिक्ष में हमारी धरती माँ बहुत बैचैन और निराश है ...
तो प्रेम क्या है ?
यह प्रश्न आपके दिमाग में अब जरूर उठ रहा होगा ..अभी तक के प्रेम को गीतकारों ,कवियों और ऋषि -मुनियों ने इन शब्दों में व्यक्त किया है कि स्त्री की ''आँखें''ही धरती का सबसे पवित्र ''प्रेमशास्त्र''होता है और पुरुष का ''ह्रदय'' इस प्रेमशास्त्र का पहला और अंतिम ''प्रेमशब्द''है .ऐसा सही भी है .लेकिन इस मिलन के परिणाम स्वरुप -साहित्य ,साम्राज्य ,संगीत और संतान का ही जन्म हुआ है .आत्मस्वर का एक 'गहरा श्वास' भी इसके परिणामस्वरुप घटित नहीं ही पाया है ...वरना ऐसा नहीं होता कि मुझे यह सबकुछ लिखना पड़ता ?
अब ऐसा क्यों नहीं हो पाया है ?
तो मेरा उत्तर है ..पहला कारण-जब कभी भी धरती पर ''वह'' युवक पैदा होगा ...तो उसकी आँखों और ह्रदय दोनों का स्वाभाव SPACE VALUE BASED...होगा .और जब कभी भी ''वो'' युवती पैदा होगी तो उसकी आँखें ,ह्रदय और शरीर..ये तीनों कमलपुष्प की गंध से महकते और दमकते हुए होंगें ...इन दोनों के मध्य कोई बात नहीं होगी ..बस थरथर्राते होंठों और डबडबायी आँखों से वे एक दुसरे को देखंगें ...और यह देख कर पूरी धरती महकता हुआ गुलाब का पुष्प हो जायगी ...
अभी धरती पर संवाद ,विवाद और विवाह का दौर चल रहा है ..
दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि एक ही काल में उन दोनों का जन्म लेना जरूरी है ..जो दुर्भाग्य से अभी तक हो नहीं पाया है .
आजकल धरती इसी ''महाप्रतीक्षा'' कि गंध से महक रही है .....
रविदत्त मोहता ,भारत
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