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Tuesday, 13 December 2011

SUN DAUGHTER SAVITRI''S VISION

यह धरती गोल-गोल क्यों घूम रही है? कभी आपने यह सोचा है ? हमने अंतरिक्ष की बहती नदी में छलांग लगाकर यह देखा है कि हमारे प्यारे अंतरिक्ष में घूमते हुए सभी ग्रह ठीक उसी प्रकार के भंवर हैं -जैसे भंवर हमारी धरती की तेज बहती नदियों में आते हैं..
                            ये भंवर इसलिए आते हैं ..क्योंकि अंतरिक्ष में हो रहे महाप्रवाह के मध्य एक केन्द्रीय प्रवाह भी है ..जोकि उस महाप्रवाह के सामानांतर पर अंदर ही अंदर बहता रहता है ..इस केन्द्रीय प्रवाह का स्वभाव है कि प्रत्येक अवस्था को अपने साथ आगे ले जाने के लिए तैयार करना .. राजी करना .
                             सो यह केन्द्रीय प्रवाह कुछेक MOMENT अंतरिक्ष  की उस सुप्त स्थति और अवस्था में ठिठक कर रुक जाता है . इस कारण महाप्रवाह का गुरुत्वाकर्षण उस स्थति और अवस्था में एक वर्तुलगति पैदा कर देता है ..परिणामस्वरुप या तो नए ग्रहों का निर्माण होता है ..या फिर किसी नए BLACKHOLE का जन्म होता है ..
                              आपको मैं यह भी बताता चलूँ कि अंतरिक्ष में स्थित सभी ब्लैकहोल्स ही अंतरिक्ष के महाफैलाव में बिखरे ग्रहों ,नक्षत्रों ,निहारिकाओं ,चन्द्रमंडलों ,और सौरमंडलों के आदि बीज हैं ..
                              इस लिए इस तथ्य को आप जान लें कि जहाँ भी गति वर्तुल है ..वहां -वहां अंतरिक्ष का केन्द्रीय महाप्रवाह सक्रिय है ..और नए अंतरिक्ष का उत्खनन वहां चल रहा है ..और इसके परिणामस्वरूप हमको अंतरिक्ष की पौषक पहन कर धरती से बातचीत करनी पड़ती है ..आज मेरी धर्मपत्नी का जन्म दिवस है ..सो आप सभी विश्वनिवासियों का आशीर्वाद चाहता हूँ ...
                                       
                                              -- रविदत्त मोहता ,भारत  
                            

Sunday, 11 December 2011

DEATH AND SUPERMAN

       मैं माफी चाहता हूँ कि इन दिनों कुछ व्यस्त रहा . सो आपसे मुलाकात नहीं कर सका . THE GREAT WAIT OF SUPERMAN ..पुस्तक की POST कुछेक दिनों बाद आरंभ कर दूंगा ..पर आज आपसे कुछ ओर कहना चाहता हूँ .
        मृत्यु इस धरती का डरावना सत्य है . मृय्यु से मुक्ति सभी की इच्छा है . इस पर हमारे प्राचीन ऋषियों ने बहुत काम किया है .पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी इस पर बहुत काम कर रहें हैं . लेकिन मृत्यु पर विजय असंभव है . कारण इतना ही है कि यह एक मानसिक बीमारी है ...जो मानव की समझ तक ही सिमित है . अतिमानव मूलतः अपनी आत्मा के अनुभव से जन्म लेगा . अतः उसके लिए शरीर इतनी ही अहमियत रखेगा -जितनी की हमारे लिए कोई पेंट  या पायजामा रखता है . . अब क्या कभी आपने सुना है कि किसी मकान की मृत्यु हो गयी ?
         किसी 'गिलास' की मृत्यु हो गयी ?
         चाय के कप की मृत्यु हो गयी ?
         या घर के दरवाजे की मृत्यु हो गयी ?
          क्यों  नहीं सुना ...? क्यूंकि जिन चीजों के मैं नाम ले रहा हूँ ..वे पहले से ही मानव दिमाग द्वारा मृत मान ली गयी है .इस लिए इनकी मृत्यु पर धरती में न तो कोई विलाप है ..और न ही कोई संवाद है !
          पर महान यह शरीर चूँकि अजर और अमर ''आत्मा'' की पदार्थ रुपी पौशाक है ...इसलिए इस पर संवाद ही संवाद है .पार्थिव शरीर की धड़कन ने धरती पर यह अफवाह फैला दी है कि उसकी मृत्यु क्यों हो रही है ? 
          शरीर की शिकायत वाजिब है ...क्योंकि हमारा शरीर हमारे [ यानि हम आत्मा ] की अजरता और अमरता के साथ लगभग १०० वर्षों तक रहता है . इस कारण यह भी हमारी आत्मा की अमरता के स्वभाव में जीना चाहता है .
          मांग वाजिब है ..परन्तु इसके लिए मानव शरीर को यथा अग्नि , वायु , आकाश , जल और पृथ्वी जैसे पार्थिव तत्वों का अतिक्रमण करके ''आत्मतत्व'' के पराकाश में प्रवेश करना होगा ...परन्तु अभी तक इसके लिए यह शरीर तैयार नहीं है . यह अभी भी ''नारी शरीर'' में ही प्रवेश करने को २४ घंटें उत्तेजित रहता है .....
                                              -- रविदत्त मोहता , भारत                   

Sunday, 4 December 2011

THE GREAT WAIT..

         क्या हम मानव इस धरती पर जला दिए और दफना दिए जाने के लिए आते है ?
          शान ने इस जला दिए जाने और दफना दिए जाने की मानव निर्मित क्रूर सामाजिक व्यवस्था से निपटने का मन बना लिया था .शान ने यह सोच लिया था कि वह जिस महान  अंतरिक्ष से उतरा है ..उसी विराट अंतरिक्ष के सत्य को धरती पर स्थापित करेगा ...चाहे जो कुछ हो जाये ..वह समझोता नहीं करेगा तो नहीं करेगा ..
           आप सभी दिल थामकर बैठ जाएँ .मैं एक ऐसे युवक की कहानी आपको सुनाने जा रहा हूँ ..जो पहली बार इस धरती की ओर आया है ..अंतरिक्ष की बियावान पर क्रूर अँधेरी आकाशगंगाओं की गलियों में सदियों भटकने के बाद जब वह पृथ्वी के सौरमंडल के पास से गुजर रहा था ..तो उसे हमारे सौरमंडल की सौरगलियों में अरबों-खरबों स्त्री ,पुरुषों ,बच्चों ,बूढों के भयानक रुदन का स्वर सुनाई दिया ..वह ठिठक कर रुक गया .
            अंतरिक्ष के अंतराल से उसने जब सौरमंडल की हमारी आकाशगंगा में झांक कर देखा तो दंग रह गया.पृथ्वी के चारों ओर अरबों-खरबों मनुष्यों के मरे हुए सूक्ष्म शरीर तैर रहें थे ..और उन सूक्ष्म शरीर के आवरण ''कारण शरीर'' बिलख-बिलख कर रो रहे थे .
             मैं आपको इस तथ्य से अवगत कराता  चलता हूँ कि हमारे स्थूल शरीर के नष्ट हो जाने बाद भी हमारा सूक्ष्म शरीर बना रहता है ..यह शरीर ठीक वैसा ही होता है -जैसा हमारा स्थूल शरीर होता है ..क्योंकि यह सूक्ष्म शरीर इतना हल्का होता है कि मानव कि मृत्यु के तुरंत बाद यह स्थूल शरीर से अलग हो जाता है ..और पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करके ..और इसका छेदन करके पृथ्वी के बाहर ''पृथ्वी कक्षा ''में पहुँच जाता है ..और फिर  पृथ्वी के भयंकर गुरुतवाकर्षण की वजह से पृथ्वी कक्षा का छेदन नहीं कर पाता..परिणामस्वरुप लाखों-करोड़ों वर्षों तक वहां असहाय तैरता रहता है ...
              इस महान अजर-अमर ''कारण शरीर'' के बारे में मैं आपकों बाद में बताऊंगा ..पहले इस ''शान'' की कहानी सुनो ...
              उसका नाम वास्तव में शानदार था .
              शान...                                                                                     [क्रमश....]                   

THE GREAT WAIT..

             मेरे सदगुरु स्वामी अवधेशानंद जी का मुझे एक कालजयी आदेश है कि मैं लगातार लिखता रहूँ ...इसी आदेश की अनुपालना में मैं आज से आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ -जो धरती की नहीं है .हमारे सौरमंडल की भी नहीं है .बल्कि सूदूर और सबसे प्राचीन अंतरिक्ष की छुपी हुई कहानी है ...इसे मैं समय -समय पर क्रमश; आपको सुनाता रहूँगा ...
             मैं आपसे यह भी अपेक्षा  करता हूँ कि आप धेर्यपूर्वक इसे पढेंगे ही नहीं ..बल्कि मेरे मुख से सुनेंगे भी ..
              तो कहानी इस प्रकार है ...
              क्या आपको नहीं लगता कि जन्म से लेकर मृत्यु तक हम किसी की प्रतीक्षा करते हैं? इस तरफ हम ध्यान नहीं देकर संसार की माया में खुद को व्यस्त कर लेते हैं ...कि जिससे वह प्रतीक्षा न करनी पड़े ..जो कभी पूरी नहीं होती.....?
              कहने को इस धरती पर हम जिसकी भी प्रतीक्षा करते हैं ..वह पूरी हो जाती है . सुबह की करें तो ..सुबह हो जाती है . रात की करें तो ...रात हो जाती है .धन की करें तो तो थोड़ा ही सही पर मिल जाता है .स्त्री की करें तो ..पत्नी रूपा मिल ही जाती है .यानी ...कहने को हमारी सभी प्रतिक्षाएं पूरी हो जाती है .प्रतीक्षा करने वाली चीज हमारे ''जीवन भिक्षा पात्र ''में डाल दी जाती है ..लेकिन इस सबके बाद भी हमें अँधेरी रातों के सुनसान कमरों में क्यों किसी की प्रतीक्षा रहती है ?
               वो कौन है ..जिसको अभी आना बाकि है ..?
                वो कौन है ..क्या कोई स्त्री है ?
                 भाग्य है ...?
                  धन है ...?
                   या कोई ईश्वर है ?...तो इसे ही मैं महाप्रतीक्षा कहता हूँ .यह प्रतीक्षा जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन के बीहड़ शरीर पर दस्तक देती रहती है ...लेकिन मानव चाह कर भी उसकी इस दस्तक को सुन नहीं पता ..और किसी गाँव की सुनसान गली में ..खांसते-खांसते दम तोड़ देता है ..और लोग दोड़कर उसके घर पहुँचते है ..और ले जाकर जला देते है या दफ़न कर देते हैं ...          [क्रमश......]   
                 

Saturday, 3 December 2011

PENDING INCIDENT...LOVE.

जब से यह धरती बनी है ..और अंतरिक्ष में आई है .तब से ही यहाँ एक महाघटना का घटित होना बाकी है .वह घटना है ...प्यार .कहने में तो विश्व के प्रत्येक छोर में हमने बहुत सारी सच्ही प्रेकथाएं पढ़ी है ...लेकिन इन सभी कथाओं का अंत ...मृत्यु ,विछोह ,नफरत या धोखेबाजी का एक धिक्कारा हुआ गीत ही बन कर रह गया है...
                   मेरा यह अटूट विश्वास है कि प्रेम रुपी महाघटना का धरती पर अभी भी घटित होना बाकी है .आदम,हव्वा से लेकर वर्तमान स्त्री -पुरुष के बीच का प्रेम मात्र एक साहित्यिक और शास्त्रीय परिसंवाद मात्र है ...क्योंकि प्रेम वह महाघटना है ,जिसके घटित होते ही अंतरिक्ष में घूमती यह धरती ''नर्त्यमुद्रा ''में आ जाएगी ..और इसका सूर्य के चारों और बेचेनी से चक्कर लगाने का दौर समाप्त हो जायगा .हाँ ..एक बात मैं कुछ नयी बताना चाहता हूँ ...आजकल धरती पर शुगर ,ब्लडप्रेसर जैसी बीमारियों का आम होना यही दर्शाता है कि अंतरिक्ष में हमारी धरती माँ बहुत बैचैन और निराश है ...
                    तो प्रेम क्या है ?
                     यह प्रश्न आपके दिमाग में अब जरूर उठ रहा होगा ..अभी तक के प्रेम को गीतकारों ,कवियों और ऋषि -मुनियों ने इन शब्दों में व्यक्त किया है कि स्त्री की ''आँखें''ही धरती का सबसे पवित्र ''प्रेमशास्त्र''होता है और पुरुष का ''ह्रदय'' इस प्रेमशास्त्र का पहला और अंतिम ''प्रेमशब्द''है .ऐसा सही भी है .लेकिन इस मिलन के परिणाम स्वरुप -साहित्य ,साम्राज्य ,संगीत और संतान का ही जन्म हुआ है .आत्मस्वर का एक 'गहरा श्वास' भी इसके परिणामस्वरुप घटित नहीं ही पाया है ...वरना ऐसा नहीं होता कि मुझे यह सबकुछ लिखना पड़ता ?
                    अब ऐसा क्यों नहीं हो पाया है ?
                     तो मेरा उत्तर है ..पहला कारण-जब कभी भी धरती पर ''वह'' युवक पैदा होगा ...तो उसकी आँखों और ह्रदय दोनों का स्वाभाव SPACE VALUE BASED...होगा .और जब कभी भी ''वो'' युवती पैदा होगी तो उसकी आँखें ,ह्रदय और शरीर..ये तीनों कमलपुष्प की गंध से महकते और दमकते हुए होंगें ...इन दोनों के मध्य कोई बात नहीं होगी ..बस थरथर्राते होंठों और डबडबायी आँखों से वे एक दुसरे को देखंगें ...और यह देख कर पूरी धरती महकता हुआ गुलाब का पुष्प हो जायगी ...
                     अभी धरती पर संवाद ,विवाद और विवाह का दौर चल रहा है ..
                      दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि एक ही काल में उन दोनों का जन्म लेना जरूरी है ..जो दुर्भाग्य से अभी तक हो नहीं पाया है .
                        आजकल धरती इसी ''महाप्रतीक्षा'' कि गंध से महक रही है .....
                                                                                       रविदत्त मोहता ,भारत             

Monday, 28 November 2011

THIRD WORLD WAR AND SEX

            विगत 20 वर्षों में मानव चरित्र का अत्यधिक पतन हुआ है ...विश्व इस पर चिंतित भी है .अगर इसी तरह यह SEXUL पतन होता रहा तो वह दिन दूर नहीं ..जब घर में घर की बेटी -बहु और पत्नी भी घरवालों द्वारा लूट ली जाएगी .और अगर मेरी याददास्त ठीक है ..तो यह घिनोना कृत्य आरंभ भी हो चुका है...
             हमारे बुजुर्गवार कहते हैं कि यह सब समय का चक्र है ..यह काल ''पतन'' का काल है ...लेकिन मेरा यह मानना है कि समय हमेशा ''पवित्र'' ही होता है .हम मानव ही इतिहास से  बार-बार SEXUL RAPE करते रहें हैं ...परिणामस्वरुप विश्व को ''युध्भूमि'' का दंश सहना पड़ा है .पहले दोनों विश्व युद्धों का गुप्त कारण  SEX-SEX AND SEX ही था .
              एक बात मैं बहुत ईमानदारी और जिम्मेदारी से कहना चाहता हूँ कि दुनियां जब कभी भी नष्ट होगी तो इसका कारण ''SEX''होगा ...आप इतिहास के मरे हुए पन्ने पलट कर देखिये ...यह विश्व सबसे ज्यादा तबाह ''सेक्स'' कारणों से रहा है ...श्रीअरविन्द आश्रम, पोंदेचेर्री, भारत की श्रीमां तो कहती थी कि मानव के ''अतिमानव'' बनने में सबसे बड़ी और एतिहासिक बाधा ''सेक्स'' है ..यह SEX हमारे DNA में सबसे ज्यादा सक्रीय ''तरंग''है ...जरा -सा इशारा मिलते ही ये ''उल्कापिंड'' की तरह शरीर में सक्रिय हो जाती है ...
              इधर मैं देख रहा हूँ कि आजकल हमारे युवाओं में यह सबसे ज्यादा सक्रिय है .''स्त्रीदोस्त'' का CONCEPT   समाज द्वारा स्वतंत्रता के नाम पर स्वीकार तो किया गया है -लेकिन इसके पीछे का कारण -धूर्त समाज का SEXUL AGENDA ही है ...
              इधर इन दिनों मेरे देखने में यह आया है कि जवान ,प्रोढ़,बूढ़े सभी अब बहती गंगा में हाथ धोने के चक्कर  में भागे फिर रहें है ...और यही मेरी चिंता का विषय है -क्योंकि किसी एक SEXUL ACCIDENT के कारण ''तीसरा विश्व युद्ध ''तय और निश्चित है .
                                                                          RAVI DUTT MOHTA INDIA   

Saturday, 26 November 2011

WE ARE MICRO UNIVERSE..

                          OUR HEART BEATING IS A WHOLE VOICE 
                                                               OF
                                                                   UNIVERSE......
                           ARE
                                  YOU
                                           HEARING
                                                              ME...... ?
                                                                        -  RAVIDUTT MOHTA, INDIA 

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Friday, 25 November 2011

THE COSMOS IS SWIMMNG IN ZERO..

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि ऐसा क्यों हुआ है..जो सभी क्रन्तिकारी आसमानी घटनाएँ हमसे पूर्व ही अंतरिक्ष में घटित हो गयी ...?सब कुछ हमारे सामने क्यों नहीं घटी ? तब अंतरिक्ष से ही उत्तर आता है ...''पुत्र ...अगर पूर्व में वे क्रातिकारी महा घटनाएँ घटित नहीं होती ,तो मानव इस धरती पर जन्म कैसे लेते ...?'' इसलिए मेरा यह स्पष्ट मत है कि मानव नामक प्राणी भी BIGBANG के परिणामस्वरुप ही जगत की इस विराट सृजन लीला में ..प्रकाश में आया है ...इसलिए हम मानवों के CORE-DNA में ही BIGBANG का रहस्य छुपा हुआ है ...जिसे D-CODE किया जा सकता है ...
                      अब मैं जगत के इस मूल रहस्य पर आज आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ ..कि क्या वास्तव में अरबों-खरबों वर्षों पूर्व कोई ''महाविस्फोट''हुआ था ..? कोई BIGBANG हुआ था ...जिसके परिणामस्वरुप यह महान अंतरिक्ष अस्तित्व में चला आया ...तो मैं BIGBANG पर कुछ टिपण्णी करना चाहता हूँ ...
                      जिस तरह बीज भूमि के अन्दर अंकुरित होने के उपरांत  विस्फोटित हो जाता है ..और उसकी जड़े भूमि में और गहरी उतर जाती है ...परिणामस्वरुप ''अंकुरण''आसमान की और बाहर निकल आता है ...यानी महाविस्फोट तो हुआ था ..परन्तु वह मानवदिमाग के मानसिक संविधान के अनुसार नहीं हुआ था ...हमारे ग्रह में विस्फोट ''बाहर''की ओर होता है ..जबकि अंतरिक्ष तो शून्य में अंकुरित और आकारित हो रहा है ...अत;वहां विस्फोट [गर्भाधान] जेसा होता है ...अन्दर गहराई में होता है ....परिणामस्वरुप ही BLACKHOLE अंतरिक्ष के अस्तित्व में आये हैं ...आप यह कह सकते हैं किअंतरिक्ष में विद्यमान BLACKEHOLES ही हमारे इस विराट अंतरिक्ष में फैली हुई अंतरिक्ष की प्राचीन जड़े हैं ...स्टीफन ठीक कहते हैं कि BLACKEHOLES में जगत का सत्य छुपा हुआ है ...
                               आज मैं एक तथ्य आप सभी के सामने रखना चाहता हूँ .NASA के कई अंतरिक्ष यात्री SPACE में जा चुके हैं ...उन्होंने वहां देखा हैं कि शून्य में ही विराट अंतरिक्ष टहल रहा है ...यानी शून्य के अंतरालों की वजह से ही पदार्थ [MATTER] को आकार और गति प्राप्त हो रह है ...शेष कल .......
                                                                   - रविदत्त मोहता ,भारत              

EYES AND COSMOS

हर युग में हमारे शरीर का कोई एक अंग ही मुख्य रूप से सक्रिय होता है ...जैसे पाषाण युग में ''पैर'' ज्यादा सक्रिय थे ...राजतंत्रीय युगों में ''मुख'' ज्यादा सक्रिय था ..राजा द्वारा बोला गया शब्द ही तब का विधान और संविधान होता था ...भारतवर्ष के युगों की अगर मैं बात करूं तो यहाँ सतयुग में -''हर्दय''...त्रेता में -''कंठ''.. और द्वापर में -''कान''...तथा आज का कलयुग -जिसे पाश्चात्य जगत 'विज्ञानंयुग''...कहता है ...इसमें हमारे शरीर का सबसे सक्रिय अंग ''आँखें''...हैं. 
                                   तो इस वैज्ञानिक कलयुग में विज्ञानं का तो यह स्वभाव ही है कि वह आँखों देखी बात को ही सत्य मानता है ...कानों सुनी को नहीं...और मानव शरीर का सबसे वैज्ञानिक और अलोकिक अंग ''आँख''..ही तो है .मैं कहना यह चाह..   रहा हूँ कि वर्ष २०१२ से मानव शरीर के इस सबसे सुंदर अंग 'आंख' को बहुत सजग रहना चाहिए ...कारण इतना ही है कि यह जरूरी नहीं होता है कि जो दिखाई देता है ..वह सच होता है ..सत्य न तो केवल दिखाई देता है ..न ही केवल सुना जा सकता है ..सत्य केवल महसूस भी नहीं किया जा सकता है ..सत्य एक महाघटना है ...जो एक साथ किसी युग में उसी पल ''एक साथ ..सुनी ..देखी ..और कही ..'' जाती है .हमें अपनी आँखों को अब ...कान और मुख का अंगसंग देकर विराट और विशाल बनाना होगा ..प्रक्रति एक विराट सपना देख चुकी है ..उस महान दिव्य घटना को इन तीनों अंगों से एक साथ देखना ही मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य होने वाला है ...
                                                                                              -रविदत्त मोहता ,भारत      

Wednesday, 23 November 2011

SUN INJECTION......

        आज ...यह बात अवश्य मैं कहना चाहता हूँ ...कि आकाश के सभी ग्रह ही वे गुप्त दरवाजे हैं ...जिनको खोलकर   हम वास्तव में अंतरिक्ष में प्रवेश कर सकते हैं ...हमारा पहला कदम होना चाहिए ,...हमारा प्यारा सोरमंडल....इसमें स्थित सभी ग्रहों में हम 'सौर  ऊर्जा' की मदद से प्रवेश कर सकते हैं ...और वहां कुछ समय तक जीवित भी रह सकते हैं ...अंतरिक्ष में स्थित सौर ऊर्जा को मैं दिव्य शक्ति मानता हूँ ...इसका कारण यह है कि इसमें 'सूर्य की अपनी धुरी पर घूमने वाली गति और रफ़्तार '...दोनों LATEST रूप से मौजूद होती हैं ...इस कारण वे किसी भी ग्रह को CHARGE करने की ताकत रखती हैं ....अगर हम इस ऊर्जा को सौरमंडल से 'संरक्षित करके ' किसी भी ग्रह में INJECT कर सकें ...तो भविष्य में वहां भी जीवन ''ऊग''...आएगा ..पर इस ''SUN INJECTION'' को किस प्रकार लगाया जाये ...यह विज्ञान के विषय का अनुशंधान होना चाहिए ....
       हमारा सौरमंडल सूर्य की अपनी धुरी पर घूमने के'' घूर्णन'' की वजह से ही ''घूर्णन गति और परिधि गति ''को प्राप्त कर रहा है ...सूर्य घूर्णन के परिणामस्वरुप हमारे सौरमंडल में एक ''सौरगुरुत्वकर्षण'' से ही सौरमंडल के अन्य ग्रह आवेशित होकर सूर्य की परिधि में प्रवेश करके उसकी ''परिधिगति'' को प्राप्त करते हैं ...
       लेकिन यहाँ प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि सूर्य को इतनी शक्तिशाली ''घूर्णनगति '' कहाँ से मिलती है ? तो उत्तर यह है कि सूर्य को यह घूर्णनगति अंतरिक्ष के महाप्रवाह की वजह से प्राप्त होती है ...और यह अंतरिक्षप्रवाह भी शून्य में अपनी एक ''CENTRAL SPIRAL ARROUNDED MOVEMENT''में बह रहा है ...
       ...इसी वजह से अंतरिक्ष में बिखरा हुआ विकराल 'गेसीय,द्रवीय और ठोसीय कचरा गोल (अन्डेनुमा) आकर को प्राप्त करता है ....और कालांतर में अंतरिक्ष की ''सर्पिल घूर्णन गति '' के परिणामस्वरुप ही ''मंडल गति ''यानी गोल-गोल घूमने वाली आकृति की गति को प्राप्त करके अंतरिक्ष के महाप्रवाह में बहता हुआ जब किसी विराट तारे के गुरुत्वाकर्षण की RANGE में आता है ..तो उसमे खींचते हुए प्रवेश करके ..उस बड़े तारे से अपनी धुरी में उसकी घूर्णन गति का एक अंश प्राप्त कर लेता है ...और उस बड़े तारे के चारों तरफ प्रदक्षिणा करने लगता है ...उसको प्रणाम करने लगता है ....अच्छा दोस्तों शेष कल ..TAKE CARE YOURSELF....
                                                                        --RAVI DUTT MOHTA ,INDIA.         

Thursday, 17 November 2011

TIME AN

अंतरिक्ष का महाप्रवाह दिशाशुन्य है ...यानि वह शून्य में फ़ैल रहा है ...इस कारण अंतरिक्ष दिशाओं और समय के बन्धनों से मुक्त है ...कहना मैं यह चाह रहा हूँ कि TIME SPAN-KAALYAATRA का CONCEPT हम तभी फलीभूत कर सकते है ...जब हम अंतरिक्ष की प्रवाहगति और इस प्रवाह्गति में विद्यमान सभी ग्रहों ,आकाशगंगाओं ,सोरमंडलों और BLACKHOLE की SPEED को पकड़ पायें ...उसे समझ पायें ...अंतरिक्ष में दो तरह की ''गतिस्थातियाँ .....'' है .
                                            पहली है ....अंतरिक्ष का फैलता लगातार महाप्रवाह ......यह प्रवाह -'गति' नहीं है ...जो अंतरिक्ष्पदार्थ 'शून्य' में फ़ैल रहा है ...बह रहा है ...उसे हम 'गति' नहीं कह सकते ...इसे हम GROWING...कह सकते है ....उद्धरण के लिए हमारी धरती पर जिस प्रकार इक बीज धरती में अंकुरित होकर एक  पेड़ में फ़ैल जाता है ....और फिर बड़ा हो जाता है ....यह बीज का प्रवाह है ...GROWING...है ....पर यह बीज की पेड़ में होने वाली कोई गति नहीं है ..''बल्कि बीज का पेड़ में GROWING है ....महाप्रवाह है.....''
                                            इसी  प्रकार मानव भी माँ के गर्भ में आने के बाद GROW.....करता है ....फलता -फूलता और फैलता है ...उसकी छोटी -छोटी अंगुलियाँ ...छोटे -छोटे हाथ ,पैर ...अंतरिक्ष के प्रवाह के  परिणाम स्वरुप GROWING...करते हुवे बड़े होते जाते हैं ....और एक दिन २०-२२ वर्ष का एक युवक होकर फिर..... किसी दिन १०० वर्ष का बूढ़ा होकर पुन; अंतरिक्ष के महाप्रवाह में ''...शामिल ...''हो जाते है ...लेकिन जिस धरती पर हम रहते हैं ...उसमे....'गति....' नहीं हैं ....GOING तो है ..पर GROWING...नहीं है ..SPEED...है ,पर SPARK..नहीं है ..यह धरती अपनी धुरी पर घूम रही है ...अपनी धुरी पर घूमने को 'गति'.. कहते है  .इसी प्रकार हमारी धरती अपनी धुरी पर घुमते हुवे सूर्य का भी चकर लगा रही है ..यह सूर्य का चक्र लगाना ..हमारी धरती की स्पीड कहलाती है ...तो 'गति' के परिणामस्वरूप ही SPEED का जन्म होता है ...लेकिन 'गति'...का यानि GOING...का जन्म अंतरिक्ष के महाप्रवाह की वजह से होता है ...तो हमें अब 'कालयात्रा'...अगर करनी है ..तो हमें अंतरिक्ष के महाप्रवाह को समझना होगा ...इस महाप्रवाह पर मैं कुछेक दिनों में अपना अनुसन्धान आपके सामने रखूगा...तब तक अंतरिक्ष रुपी स्लेट पर ...स्टीफन हव्किंस जैसे महान वैज्ञानिक का नाम लिखकर अंतरिक्ष को SALUTE.......करें ...और महाप्रवाह के मेरे GROWING CONCEPT की प्रतीक्षा करें ....
                                                                       - रविदत्त मोहता ,भारत    

Wednesday, 16 November 2011

KAALYATRA-TIME SPAN

इस सदी के महान वैज्ञानिक ''स्टीफन हव्किंस'' की ''कालयात्रा'' पर मैंने इन दिनों DISCOVERY CHANNEL पर एक DOCUMENTRY देखी है ...SIR STIFAN ने अपनी असाधारण प्रतिभा से BLACK HOLE पर भी बहुत अच्छा काम किया है ..और उसी प्रज्ञा से ''कालयात्रा'' का उनका अनुसन्धान है ...इधर अंतरिक्ष ,समय ,और धरती ...ये मेरी भी अन्तरिक्ष्य प्रिय नदिया रही हैं ...इनमे मैं भी अक्सर छलांग लगाकर नहाता रहा हूँ ...अत; मैं इस ब्लॉग के माध्यम से TIME MAGZINE और STIFAN HAWKINS तथा NASA को कुछ और तथ्यों से भी अवगत कराना चाहता हूँ ....
                                     यह एक तथ्य है कि कोई भी ग्रह 'स्वभाव से समय सापेक्ष ' ही होता है ..और अंतरिक्ष -समय निरपेक्ष ....होता है ...यानि जिस धरती पर हम रहते हैं ...वह समय सापेक्ष स्वभाव की है ...परन्तु अंतरिक्ष -''समय निरपेक्ष स्वभाव का ''...है ...
                                     अब अगर मैं धरती की काल यात्रा पर निकलूँ ....और भविष्य की काल यात्रा पर निकलूँ...तो मैं यह यात्रा आरम्भ ही नहीं कर सकता ....क्योंकि सारी धरती समय सापेक्ष है ...वर्तमान में है ...और उपस्थित है ...इसी तरह अगर में भूतकाल की यात्रा पर इस धरती पर निकलूँ ...तो भी स्थति कालसापेक्ष ही है ...और वर्तमान है ...उपस्थित है ...यानि स्थूल जगत में समय हमेशा ''सापेक्ष'' ही होता है ...वर्तमान में होता है ...इसी तरह ...अगर मैं अंतरिक्ष में छलांग लगाकर किसी अंतरिक्ष यान की सहायता से काल यात्रा पर निकलूँ ....तो वहां न तो भूतकाल का अस्तित्व है ...और न ही भविष्य का है ...अंतरिक्ष ''कालनिरपेक्ष'' अवस्था में है ....यह एक महाप्रवाह है ...अंतरिक्ष को में स्थूल नहीं मानता ...क्योकि यहाँ ''शूक्ष्म और शून्य दोनों में दिखाई देने वाला अंतरिक्ष रहता है ...लेकिन धरती पर स्थूल में शूक्ष्म रहता है ......
                                                अब शेष बात कल ..........................रविदत्त मोहता ,भारत      

Saturday, 12 November 2011

SUPERMAN.........

आज मन बना है कि आपसे ''अतिमानव'' के बारे में कुछ और बातें करूँ ....भारतवर्ष के पूर्व अवतार श्रीकृष्ण ने भी SUPERMAN पर बहुत काम किया था .गीता के सारे अध्याय उस ''SUPERMAN'' को ''अर्जुन'' में से अंकुरित करने के मन्त्र ही थे ...जो उस समय के ''मानवश्रेष्ठ अर्जुन'' में विधमान थे ..इसलिए गीता में श्रीकृष्ण ने ''अर्जुन'' को कई बार.....'हे मनुष्यश्रेष्ठ अर्जुन' के नाम से संबोधित किया है ...पर ''डार्विन'' तक आते-आते ''SUPERMAN'' का अतिमानवी विचार एक नए शरीर की मांग करने लगा ...तब SCIENTIST DARVIN ने यह कहा कि मानव तो प्रकृति के एक क्रमिक विकास का परिणाम है ..EVOLUTION OF MAN की EQUATION वहीँ से प्रकाश में आयी..और सारे संसार ने इस विचार को स्वीकृति प्रदान की ...लेकिन दार्शनिक 'नीत्से' का 'अतिमानव' बहुत कूर हो जाता है ..नीत्से के मतानुसार वर्तमान मानव को कुचलने वाले किसी 'BIENG' का नाम 'SUPERMAN' है ..परन्तु इस अतिमानव को अन्तरिक्ष से धरती पर आने को आमंत्रित और मजबूर किया ..पांडेचेरी की श्रीमा और श्रीअरविंद ने ...'THIS WAS ON ACCOUNT OF SUPERAMENTAL FORCE AND SUPERAMENTAL PRAYER BY THEM ...परिणामस्वरूप 'अतिमानव' को अन्तरिक्ष से कूद कर वायुमंडल में प्रवेश करना पड़ा ..
              पाश्चात्यजगत में अतिमानव को शारीरिक रूप से बहुत शक्तिशाली बताया गया है .उसको आसमान में उड़ते हुए ...गायब होते हुए ..और कोई भी रूप धरते हुए बताया गया है ..परन्तु वास्तव में क्या 'अतिमानव' ऐसा ही है .....?     मानव तो यही चाहता है कि..अतिमानव उसकी मानसिक सरंचना के अनुकूल ही जन्म ले ..और कार्य करे ..लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि अतिमानव भला हमारी मानसिक धाराओं के अधीन होकर क्यों खुद की अनुकृति करेगा ..और अगर कोई ऐसा करता है.... तो वह अतिमानव कैसे हो सकता है ...?फिर तो वह भी 'मानव' की मानसिक श्रेणी में ही रूका हुआ एक 'आम मानव' रह जाता है ..तो अतिमानव कैसा है ,,,? आज उसके सबसे बारीक दरवाजे को खोल रहा हूँ ...अतिमानव मूलरूप से एक शक्तिशाली विद्युत् गति का CHAIN BLAST का लघुअन्तरिक्ष है ..इस कारण वह अन्तरिक्षपुत्र है ..पर वह मानवजाति के बीच रहते हुए अपने आदि और अनादि स्वभाव के कारण खुद को बहुत 'अकेला' और उदास पाता है..सौरमंडल की इस लघु आकाशगंगा में धरती नामक ग्रह में वह खुद को एक 'आदिमानव' की तरह भटकता हुआ पाता है ...किसी विराट प्रसव पीड़ा से गुजर रहे इस अतिमानव को हमारी  सहमती और प्यार की इसलिए आवश्यकता है ...क्योकि इसी आधार पर वह हमारे लिए सौरमंडल के सभी ग्रहों को अपनी वर्तुल और सर्पिल गतियों में बदलाव करने को राजी कर सकेगा ...परिणामस्वरूप धरती पर पसरीहुई इस भयंकर बीमारी 'DEATH' से मुक्त हो जायगी ...तो..GROW AHEAD...इस अतिमानव के बारे में अधिक जानने के लिए मेरी LATEST BOOK -'अतिमानव'. पढ़े ....यह पुस्तक आप EMAIL से भी प्राप्त कर सकते है ...मेरा ईमेल है ...raviduttmohta@gmail.com                      रविदत्त मोहता ...भारत .          

Sunday, 6 November 2011

GOD IS NOW......

अनादिकाल से यह प्रश्न सापेषरूप से धरती पर पूछा जाता रहा है .....कि क्या ईश्वर है ?...आज मैं NATURE की एक CHEMISTRY के बारे में आपको बताना चाहता हूँ ....हम इस धरती पर ''नहीं '' शब्द इस कारण उच्चारित कर पाते है ...क्योंकि अस्तित्व का ही दूसरा नाम ''हाँ'' है ...आप छलांग लगाकर देखिये इस प्रकाशित और जलते हुए अन्तरिक्ष में ...यहाँ ''हाँ'' यानि ''YES'' में से ही ''NO-NESS'' यानि ''नहीं'' का जन्म हो रहा है ...मेरे कहने का आशय यह है कि अन्तरिक्ष के सारे विस्फोट ...जिसमें ''BIG-BANG'' का महाविस्फोट भी शामिल है ...इस ''नहीं'' रुपी ''हूंकार'' की स्थापना के लिए ही कालान्तर में हुआ था ....लेकिन परिणाम क्या निकला ...इस ''नहीं'' के महाविस्फोट में से हम मनुष्य रुपी ''हाँ'' भरे आदम चेहरे बाहर निकल आये ..तो अंतत; अस्तित्व ने फिर अपने होने का परिचय मनुष्य रूप में जन्म लेकर दे दिया ...ईश्वर ही अनादि काल से अन्तरिक्ष में विस्फोटित होकर ''अंकुरित'' हो रहा है ...ये विस्फोट अन्तरिक्ष की ''CHEMISTRY'' के आदि और अनादि मन्त्र हैं ...यानि ''NO-NESS'' में से ही ''NOW-NESS'' का जन्म होता है ..ईश्वर ''NOW'' है ...और है .......     रविदत्त मोहता ,भारत  

Sunday, 30 October 2011

THE ROLE OF UNO NOW.......

विश्व की रातें गहरी और काली होती जा रही है ...विभिन देश अपना-अपना  सिर विश्व मानचित्र से बाहर निकालकर यह देख रहें हैं कि क्या कोई है .....? जो उन्हें बचा लेगा .....?देशों और देशान्तरों के बीच की गुप्त लड़ाईयां अपनी FINAL STAGE पर पहुँच रही है ...विश्व बाजार अपनी अंतिम बिकवाली के लिए तैयारी कर रहा है ...वहीं विश्वग्राहक अपनी अंतिम खरीदारी की व्यवस्था कर रहा है ...भूमंडल की सीमाएं अपने-अपने देशों का ध्वज पकड़कर ; उचक-उचकर UNO की ओर देख रहें हैं ...साहित्य ,कला ,विज्ञान और संगीत की दुनियाँ का स्वर गाते-गाते रो पड़ता है ...विश्व राजनीति या तो अमरीका की ओर देख रहीं हैं ....या फिर आसमान की ओर देख कर दम तोड़ रहीं हैं ...इस महाभयंकर असुरक्षा के दौर में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है ...चीन, ब्रिटेन ,अमरीका और फ्रांस आदि देशों को मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ ...विशेषकर वीटो  अधिकार प्राप्त अमरीका और चीन को ...PLEASE  वे एक प्रस्ताव शीघ्र ही UNO  में लेकर आये ...की जिसमें UNO की तरफ से प्रति देश में एक CIVIL CORE GROUP  की स्थापना की जाये ...इस CIVIL CORE GROUP  में उस देश के प्रतेक FIELD से यथा विज्ञानं , साहित्य ,संगीत ,धर्म,अध्यात्म ,राजनीति ,सामाजिक आदि से LATEST YOUTH  का चयन UNO अपनी देख-रेख में गोपनीय तरीके से करके उन्हें उस देश की समसंयाओं से UNO  को अवगत कराने की जिम्मेदारी सौंपें ....क्योंकि पिछले दशकों में मेरे देखने में यह आया है कि सरकारों के देशिक स्वार्थों ,मांगों ,और EGO की वजह से ही आतंकवाद ने अपना सिर उठाया है ...और आने वाला समय तो इससे भी खतरनाक इसलिए होगा ...क्योंकि विश्वबाजार को कुछेक वैश्विक धनिक परिवारों ने हडपने का प्रयास करना आरम्भ कर दिया है ...इससे समूचा  वैश्विक अर्थशास्त्र लडखडाकर धडाम से जमीन पर गिर पड़ेगा ...इससे पहले कि विश्व की धनसंपदा और शक्ति कुछेक लोगों के हाथ चली जाये ...UNO को तुरंत ही प्रति देश में एक CIVIL CORE GROUP  की स्थापना इसलिए कर देनी चाहिए कि जिससे इसतरह की विष्फोटक समस्याओं को मोनिटर करके UNO  को जमीनी हकीकत से अवगत कराया जा सके ...ऐसा मेरा विनर्म सुझाव है ..अगर आपका भी कोई सुझाव हो तो मेरे साथ SHARE करें ...मेरा EMAIL ID है  ....raviduttmohta@gmail.com .......प्रतीक्षा में .......         - रविदत्त मोहता

THE TRUTH OF 2012

हमने धरती के पाँचों तत्वों से वो सहज मुलाक़ात करना बंद कर दिया है , जेसी कभी हमारे महान पूर्वज इनसे किया करते थे .आज के बच्चों का ''आकाश तत्व '' टीवी का SCREEN है . बीयर ,शराब और COLD DRINKS इनका ''जलतत्व'' है ...प्रतिशोध ,नफ़रत, और धन कमाने की वासना इनका ''अग्नितत्व''है .तेज दौड़ते वायुयान ,रेलगाड़ियाँ और कारें आदि इनका ''वायुतत्व''है.और  .....लडकियां इनका ''पर्थ्वितत्व''है .वर्तमान युग की मनावप्रजाती अंतरिक्ष के महान पंचतत्वों से विलग हो गयी है .यही कारण है कि किसी दिन इक साथ ये पंचतत्व यथा -अग्नि,वायु,जल,प्रथ्वी और आकाश ....मानवजाति का भक्षण करने के लिए वर्ष २०१२ से ACTIVATE होने वाले हैं ...मैं विश्व से अत; यह प्राथर्ना करता हूँ कि हम जितना शीघ्र हो पुन: इन पञ्च तत्वों से जुड़ जाए ...क्योंकि हम सभी का शरीर भी इन्हीं पञ्च तत्वों से मिलकर बना है ...सो इनके प्रति हमारी उपेक्षा हमारे शरीर को हमारे ही द्वारा नष्ट  करने का एक भयंकर प्रयास है ....मैं देख रहा हूँ कि धीरे-धीरे मानवजाति असाध्य बीमारियों और प्राक्रतिक आपदाओं के द्वारा मारी जा रही है ...वर्ष 2012 का सच MENTAL DISORDER से आरम्भ होकर मानव शरीर के DESTROY होने की दर्दनाक कहानी का आरंभिक सच न बन जाये .............
                    रविदत्त मोहता    

Friday, 28 October 2011

ART OF BIENG MOVEMENT

आज अभी भारतवर्ष में रात्री के दो बजे हैं .मैं एक आत्मप्रेरना से उठ बैठा हूँ ....और यह पोस्ट लिखने बैठ गया हूँ ...  मैं देख रहा हूँ कि मुझे हमारे महान पूर्वज सुदूर अन्तरिक्ष के झरोंखों से झाँक कर यह कह रहें हैं कि हम अब धरती पर रहना सीख लें ...वरना सन २०१२ से जो MENTAL DISORDER पूरी धरती पर होने वाला है ..वह बहुत  ही भयानक होगा ...मैं देख रहा हूँ कि अभी कुछेक वर्षों से भारतवर्ष में मेरे आदरणीय कुछ सन्यासियों ने और समाजसेवियों ने राजनेतिक व्यवस्था के खिलाफ तथा सामाजिक कुव्यवस्था के खिलाफ ...जैसे भर्ष्टाचार आदि के खिलाफ एक मुहिम चला दी है ...विशेषकर मैं आदरणीय श्रीअन्नाहजारे जी , श्रदेय बाबारामदेव जी और श्री श्री रविशंकर जी के नामों का उल्लेख करना चाहूंगा ..पर मैं इनके प्रयासों के तरीकों से सहमत नहीं हूँ ...कारण यह है कि जब कभी भी धरती के वायुमंडल में विरोधस्वरूप कोई स्वर उठता है ...तो वह स्वर कालजयी स्रजन करने की शक्ति खो देता है ...हम अगर गौर से देखे तो पायेंगे कि प्रक्रति के पाँचों महान तत्व यथा हवा ना तो अग्नि के खिलाफ धरती पर है ...न ही आकाश इस धरती के खिलाफ है ...और ना ही वायु धरती पर व्याप्त आध्यात्मिक शान्ति के खिलाफ है ...ये पाँचों महान तत्व बस अपने होनेपन को लेकर ईमानदार है ..लेकिन ये सभी एक दूसरे के खिलाफ नहीं है ..इसी कारण धरती पर हमारा जीवन अभी तक बना हुवा है ..मैं इसी विज्ञान को धरती को बचाए रखने के लिए आवश्यक मानता हूँ ...अतः धरती पर अब इसी महान आध्यत्मिक संक्रांति की सन २०१२ से परम आवश्यकता है ...हमें स्वर के इस महानविज्ञान को फिर नष्ट होती इस धरती को बचाए रखने के लिए लागू करना होगा ...यही अन्तरिक्ष के अंतराल के मध्य स्थित संविधान की हमसे मांग है ..यही ART OF BEING का मेरा सपना और लक्ष्य है ...क्योंकि धरती को आज क्रान्ति की नहीं बल्कि एक महान ''संक्रांति'' की आवश्यकता है .....                      -  रविदत्त मोहता    

Wednesday, 26 October 2011

GURUPARV-DEEPAAWALI

प्यारे भाईओं और बहनों ,
                                   भारतवर्ष में दीपावली का पर्व आज मनाया जा रहा है . मैं दीपावली को ''गुरुपर्व''मानता हूँ .  क्योकि सद्गुरु ही दीप जलाने की कला को जानते हैं .मित्रों...भारत एक ऐसा देश है -जहां आज भी रोज शाम को महिलांए अपने -अपने घर में बनाये छोटे -छोटे मंदिरों में दीप जलाती हैं ....मेरा देश मूलत; ''ऊर्जा''का देश है . हम ''ऊर्जा''के विज्ञान को जानते हैं .हम सभी ''प्रकाश की जलती मशाले'' हैं और सुदूर अन्तरिक्ष के प्रकाशित छोर से इस ग्रह पर एक नया ''दीपपत्र''लिखने आये हैं ....तो आज से हम ''एकदूसरे''के घरों में दीप जलाना आरम्भ करें ....''दीपों के दान '' को ही मेरे गुरु दीपावली कहते हैं ...महान अमरीका को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें ...
                                                                                                 --रविदत्त मोहता ,भारत

Monday, 24 October 2011

ROOH KI ANGULIYOUNE

           सुबह -सा ऊजला चेहरा तेरा 
          


 रूह का घूंघट 
                     
                      ओढ़े तकता किसे
दीप -सा जलता चेहरा तेरा 
आरती का टीका बन सजता किसे 
रूह की सेज पर सजा पहरा तेरा 
चाँद को तकते -तकते थकता किसे 
होंठों की दबिश में दबा सेहरा तेरा 
अंगड़ाई आँखों से बहकता किसे 
सुबह को खोदते सुनहरे पाँव तेरे 
आकाश के ताजे सूर्य उगाते किसे                   - रविदत्त मोहता       

Saturday, 22 October 2011

MAHAAPRTIKSHA

आज सुबह जब उठा इस बियावान धरती पर ......तो देखा कि फिर सुबह आसमान से धरती पर गिर पडी थी .आकाश के पूर्वी छोर से लंगडाते हुए दिन निकल रहा था ....इधर दूर अन्तरिक्ष में सूर्य अपने सौरमंडल से धूप के महीन धागों से एक सुंदर साडी बुनकर धरती को पहना रहा था ....आज फिर मैंने देखा कि मेरी ''महाप्रतिक्षा'' सुदूर अन्तरिक्ष के एक झरोखे से टुकुर-टुकुर झांककर देख रही थी ...क्योकि मैंने उसे वचन दिया है कि मैं उसकी इस धरती पर तब तक प्रतीक्षा करूँगा ...जब तक वह मेरे दिव्य होंठों का स्वर न बन जाए ....कि जब मैं उसे गुन्गूनादू
तो कब्रिस्तान और शमशान भी श्रीकृष्ण की बांसुरी के स्वर बनकर जाग उठे ...और सभी मृत शरीर पुन्ह जीवित होकर इन प्राचीन मृत्युशास्त्रों से बाहर निकल आये ...मैं इन सभी को छाती से लगाने के लिए ही सूर्यपुत्री ''सावित्री''  की इस धरा पर ''महाप्रतिक्षा'' कर रहा हूँ ......                                                 -  रविदत्त मोहता   

Wednesday, 19 October 2011

USA AND INDIA

मैं हमेशा से एक बात कहता रहा हूँ कि अमेरिका एक ऐसा देश है -जो सबसे पहले ''अतिमानव''का स्वागत करेगा . कारण इसका इतना ही है कि ईश्वर ने अमेरिका को दुनिया का नेत्रत्व प्रदान करने का जिम्मा सौंपा है -पर वहीँ भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करने का जिम्मा दिया है .....LEADERSHIP AND GUAIDENCE ये दोनों जुड़वाँ भाई हैं ....और हमारी यह प्यारी धरती इन दोनों देशों की महान जिम्मेदारी है .........       - रविदत्त मोहता                                          

Saturday, 15 October 2011

EVOLUTION OF BEING

सूर्य का चक्कर लगाती इस धरती पर हम लाखों वर्षों से रह रहे हैं .... दूसरे शब्दों में हम लाखों वर्षों से सूर्य के चारों तरफ प्रदक्षिणा कर रहें हैं ..... इस प्रकार हमारा जन्म गति के वर्तुल प्रकार के परिणामस्वरूप हुआ है . लेकिन जिस सौरमंडल के केंद्रीय ग्रह सूर्य के चारों ओर हमारी धरती घूम रही है -वह सूर्य और हमारी धरती अपनी धुरी पर भी घूम रहें हैं .....इस घूर्णन गति की वजह से ही अन्तरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण का जन्म हुआ है . धरा पर सभी जीव-जंतु घूर्णन गति और वर्तुल गति के कारण ही चल-फिर और रूक पाते हैं . EVOLUTION OF BEING का सिदान्त मेरे मतानुसार इसी कारण इस ग्रह पर है . वर्तुल गति हमें मृत्यु की तरफ ले जाती है .....परन्तु घूर्णन गति हमें पुन; जीवन प्रदान कर देती है . अब मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए हमें वर्तुल गति को त्यागना होगा . वर्तुल गति को त्यागना ही ''अतिमानस'' का पहला कदम है . यानि घूर्णन गति में सूर्य की तरह विस्फोटित होकर भी अपनी धुरी पर बने रहना . यही चेतना हमें सूर्यमुखी रुद्राक्ष बनाकर अजर और अमर कर देगी .यह मेरा अनुभव है .            रविदत्त मोहता                                   

MIND-OVERMIND-SUPERMIND

धरती पर अभी तक दो तरह के मस्तिष्क ने जन्म लिया है . पहला है -मनुष्य का मस्तिष्क और दूसरा है -देवताओं का मस्तिष्क . देवताओं के मस्तिष्क को अंग्रेजी में OVERMIND यानि ''अधिमानस'' कहते हैं . अधिमानस को बहुत पुख्ता तरीके से भगवान् श्रीकृष्ण ने भूतकाल में अभिव्यक्त किया था . इस ''अधिमानस'' के पास लीलाएं और चमत्कार तो था ....पर धरती को मृत्यु से मुक्त करने का कोई स्थाई समाधान नहीं था . ... इसी कारण श्रीअरविंद ने अन्तरिक्ष के अंतरालो से ''SUPERMIND''यानि अतिमानस को धरती पर आने के लिए राजी किया . यह वही ''अतिमानस'' है -जोकि भविष्य के ''अतिमानव''के पास है . इसकी पहली विशेषता यह है कि यह धरती को मात्र एक पुस्तकालय समझता है . इसलिए यह हमारे लिए सुदूर अन्तरिक्ष से कुछ नया और ताजा जीवन लेकर आ रहा है .....हमें इसका पुरजोर स्वागत करना चाहिए . मित्रों .....चाहता हूँ कि आप भी मुझे मेरी हर POST का जवाब जरुर दे .                                                                       रविदत्त मोहता

Friday, 14 October 2011

SUPERMAN

              मानव का क्रमिक -विकास लोकतन्त्रों और राजतंत्रों से नहीं होता .यह विशुद्ध रूप से एक आध्यात्मिक घटना होती है .क्रमिक -विकास में महत्वपूर्ण भूमिका धरती के आकाश और ब्रमांड में फैले 'डार्क-मैटर'की होती है .अंतरिक्ष में गति वर्तुल नहीं है -बल्कि 'सर्पिल' है .इसी कारण हिन्दू देवताओं के महादेव शिव के गले में 'सर्प'एक ब्रह्मा के रूप निवास करता है .                                                                                                                                         मैं आज एक 'तथ्य'आप सभी को यह भी बताना चाहता हूँ किश्रीकृष्ण जहाँ चेतना के स्तर पर 'अतिमानव' को सहायता प्रदान कर रहें हैं -वहीँ महादेव-शिव देहिक स्तर पर अतिमानव' का नया शरीर रच रहें हैं   ..........                                                                             - रविदत्त मोहता

Wednesday, 12 October 2011

श्रीमा और श्रीअरविंद वर्तमान युग के आदिपुरुष और आदिस्त्री हैं . हर नया कलेवर अपने युग का आदिमानव्  होता है .........                                                                                                         रविदत्त   

Tuesday, 11 October 2011

GROW

WE ARE HERE TO GROW.....NOT FOR GO.......SO....SHOW MUST GROW ON.......AND THEN ,WE SHALL BRO-ON.                                                                                                      RAVIDUTT MOHTA

Sunday, 9 October 2011

Biography

TODAY, I AM PUBLISHING MY GLOBLY RECOGNISED BIOGRAPHY -'EK AADIMANAV KI AATMKATHA'. THIS BOOK HAS BEEN SELECTED BY 'USA;S RENOWNED-'LIBRARY OF CONGRESS'.MY GREAT GURU DR.AWADESHANAND GIRI JI INNOUGRATED THIS BOOK AND TODAY MY WIFE SMT.VANDANA MOHTA IS SHARING MY VISION WITH ALL OF YOU.                                                                                                                  
                                                                                                                               RAVIDUTT MOHTA